
That in Varsana we are under Srimati Radharani's shelter, here is Her janma-lila. He mentioned how Srila Prabhupada was very reserved whenever he talked about Radharani - She is so special, all happiness expands in Her, and Krsna expands Himself in Her, She is the source of all fortune and the original angel. Krsna does not tolerate any offenses against Her. . .
When King Vrshabhanu offers his Beautiful, blind baby girl to Narada Muni for blessings, Narada Muni became overwhelmed in ecstasy, his hair stood on end, tears were flowing from his eyes, all his body was shivering. . .Narada Muni took that girl baby and put her on his lap. He started to think :'I have gone to all the places in the entire universe, no where I had found such a beautiful girl like this. NOWHERE!!
I am very fortunate.' Then he tells King Vrshabhanu that he is very very fortunate to have this baby girl as daughter. Wherever this girl is, this place resides the Goddess of Fortune. So your duty is just to take care of this baby and nothing else. Narada Muni prayed to Radharani with very pleasing prayers, having Her on his lap. He asked Her to give darshan of Her Youthful Kishori form. Radharani being very pleased appeared before him with all Her sakhis and told Narada Muni to meet Her in Kusum Sarovar. Accordingly Narada Muni got darshan of Srimati Radharani in Her Kishori Form which is very very pleasing, which attracts the Supreme Personality of Godhead.

प्रगट्यो सब ब्रज को सिंगार
सर्वेश्वरी श्रीराधारानी का जन्मोत्सव 15 सितंबर को मनाया
त्वं देवी जगतां माता विष्णुमाया सनातनी ।

भगवान श्रीकृष्ण को समझने और पाने के लिए युगों-युगों से ऋषि-मुनि, संत-विद्वान भगवती राधा का आश्रय लेते रहे हैं। सच्चिदानंद श्रीकृष्ण के प्रेम-रस का पान करने और भक्तों को कराने के लिए कवि भी राधा-भाव ग्रहण करने की कोशिश करते रहे हैं। सदा से श्रीराधाही श्रीकृष्ण-प्रेम के भजनों की प्रेरणास्त्रोत रही हैं।
श्रीकृष्ण की भक्ति, प्रेम और श्रृंगार रस की त्रिवेणी जब हृदय में प्रवाहित होती है, तब मन तीर्थराज बन जाता है। सत्यम्- शिवम्-सुंदरम्का यह महाभावही राधाभाव कहलाता है। श्रीकृष्ण हैं आनंदघन वैष्णवों के लिए श्रीकृष्ण परम आराध्य हैं। वे श्रीकृष्ण को ही अपना सर्वस्व मानते हैं। संत जन यह जानते हैं कि श्रीकृष्ण ही परमपुरुष और आनंदघनहैं।
आनंद ही उनका स्वरूप है। श्रीकृष्ण ही मूर्तिमान आनंद हैं। इसलिए आनंदघनभगवान श्रीकृष्ण की उपासना मात्र वैष्णवों के लिए ही नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के लिए आनंददायक है। प्रत्येक प्राणी जन्म से मृत्यु तक प्रतिक्षण आनंद की तलाश में रहता है, क्योंकि आनंद के सिवा अन्य कोई चीज उसके लिए दुर्लभ नहीं है।
आनंद किसे कहते हैं? आनंद कहां है? और वह आनंद कैसे मिल सकता है? ये बातें आम आदमी नहीं जान पाता है। वह सांसारिक विषयों में आनंद खोजता है, लेकिन वहां से उसे आनंद नहीं मिलता। अनेक जन्मों के पुण्यकर्मोका फल संचित होने पर ही प्राणी यह मर्म जान पाता है कि श्रीकृष्ण ही आनंद का मूर्तिमान स्वरूप हैं। सद्गुरु की कृपा और सत्संग से इस रहस्य के उजागर होते ही मनुष्य की जन्म-जन्मांतर की जिज्ञासा शांत हो जाती है। तब उसके समक्ष यह प्रश्न आता है कि आनंदघनश्रीकृष्ण को पाया कैसे जाए? ऐसी स्थिति में प्राणी कृष्ण-प्रेम की अधिष्ठात्री भगवती राधा की शरण लेता है।
यह ध्यान रखिए कि जहां आनंद है, वहीं प्रेम है और जहां प्रेम है, वहीं आनंद है। आनंद बिना प्रेम के नहीं होता और प्रेम बिना आनंद नहीं होता।
जिस प्रकार श्रीकृष्ण आनंद का घनीभूत विग्रह हैं, उसी तरह राधाजीप्रेम की घनीभूत मूर्ति हैं। इसलिए जहां श्रीकृष्ण हैं, वहीं राधा हैं और जहां राधा हैं, वहीं श्रीकृष्ण हैं। कृष्ण बिना राधा या राधा बिना कृष्ण की कल्पना के संभव नहीं हैं। इसी कारण श्रीराधामहाशक्ति कहलाती हैं। राधिका हैं राधा श्रीराधोपनिषदमें राधा का परिचय देते हुए कहा गया है- कृष्ण इनकी आराधना करते हैं, इसलिए ये राधा हैं और ये सदा कृष्ण की आराधना करती हैं, इसीलिए राधिका कहलाती हैं। ब्रज की गोपियां और द्वारकाकी रानियां इन्हीं श्रीराधाकी अंशरूपाहैं। ये राधा और ये आनंद-सागर श्रीकृष्ण एक होते हुए भी क्रीडा [लीला] के लिए दो हो गए हैं। श्रीराधिकाश्रीकृष्ण की प्राण हैं। इन राधा रानी की अवहेलना करके जो श्रीकृष्ण की भक्ति करना चाहता है, वह उन्हें कभी पा नहीं सकता। श्रीकृष्ण की आत्मा अथर्वेदीयराधिकातापनीयोपनिषत्का भी कहना है कि श्रीराधिकाजी और आनंदसिंधुश्रीकृष्ण एक ही शरीर और एक दूसरे से अभिन्न हैं। केवल लीला के लिए वे दो स्वरूपों में व्यक्त हुए हैं, जैसे शरीर अपनी छाया से शोभित हो। स्कंदपुराणके अनुसार श्रीराधाभगवान श्रीकृष्ण की आत्मा हैं। उनके साथ सदा रमण करने के कारण ही ऋषि-मुनि श्रीकृष्ण को आत्माराम कहते हैं।
इसी कारण भक्तजन सीधी-साधी भाषा में उन्हें राधारमण कहकर पुकारते हैं। पद्म पुराण में परमानंद रस को ही राधा-कृष्ण का युगल-स्वरूप माना गया है। इनकी आराधना के बिना जीव परमानंद का अनुभव नहीं कर सकता। भविष्य पुराण और गर्ग संहिता के अनुसार, द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी पर अवतरित हुए, तब भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन महाराज वृषभानुकी पत्नी कीर्ति के यहां भगवती राधा अवतरित हुई। तब से भाद्रपद- शुक्ल- अष्टमी राधाष्टमी के नाम से विख्यात हो गई।
वैष्णवजनइस तिथि के दिन बडी श्रद्धा और उल्लास के साथ व्रत-उत्सव करते हैं। दर्शनशास्त्र की दृष्टि से देखेंगे, तो यह पाएंगे कि कृष्ण प्रेम की सर्वोच्च अवस्था ही राधाभावहै।
राधा का प्रेम निष्काम और नि:स्वार्थ है। उनका सब कुछ श्रीकृष्ण को समर्पित है, लेकिन वे बदले में उनसे कोई कामना की पूर्ति नहीं चाहतीं। राधा हमेशा श्रीकृष्ण को आनंद देने के लिए उद्यत रहती हैं। इसी प्रकार मनुष्य जब सर्वस्व-समर्पण की भावना के साथ कृष्ण प्रेम में लीन हो जाता है, तभी वह राधा-भाव ग्रहण कर पाता है। इसलिए कृष्णप्रेमरूपीगिरिराज का शिखर है राधाभाव।तभी तो श्रीकृष्ण का सामीप्य पाने के लिए हर कोई राधारानीका आश्रय लेता है।
महाभावस्वरूपात्वंकृष्णप्रियावरीयसी।
प्रेमभक्तिप्रदेदेवि राधिकेत्वांनमाम्यहम्॥
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जो हर पल, हर घड़ी, हर दिन, किशन को याद आती है
उसी का नाम है राधा, वही राधा कहाती है.
जो करती प्यार कान्हा से , नहीं कुछ चाहती बदला
मगर उसके इशारे को कभी समझा नहीं पगला
जो बंसी की सदा सुनकर चली पनघट पे आती है
उसी का नाम है राधा, वही राधा कहाती है.
वो जिसके प्यार में डूबा कन्हैया भूलता सब कुछ
वो जिसके इक इशारे पर कहे मैं, दूँ लुटा सब कुछ
वो जिसकी याद रह-रह कर कलेजा चीर जाती है
उसी का नाम है राधा, वही राधा कहाती है।
नहीं वो दो नहीं , वो एक हैं, बेशक हैं तन से दो
है उनका साथ जन्मों का, सदा मिलते जुदा हो-हो
वो जिनकी इक जुदाई ही किशन लीला कराती है
उसी का नाम है राधा, वही राधा कहाती है।
वो जिसके प्यार की सीमा नहीं जाने मुनि ज्ञानी
वो जिसके प्यार में खोकर किशन बन जाए अज्ञानी
जगत के नाथ को जो अपनी ऊँगली पर नचाती है
उसी का नाम है राधा, वही राधा कहाती है।
कहा है श्याम ने, मैं पीछे -पीछे चल पडूँ उसके
अगर रा,,,,,,, ही निकल जाए किसी के प्यार से मुख से
वो जिसके नाम की धुन श्याम को सेवक बनाती है
उसी का नाम है राधा, वही राधा कहाती है।
जो भजना है भजो राधा, जो जपना है जपो राधा
जगे हो तो भजो राधा , स्वप्न में भी भजो राधा
जो खुश हो जाए राधा, श्याम से परिचय कराती है
उसी का नाम है राधा, वही राधा कहाती है.
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